Concept of Shad darshana दर्शन का अर्थ है
1. दर्शन का अर्थ और परिभाषा
(Meaning and Definition of Darshana)
भारतीय संस्कृति और ज्ञान-परंपरा में “दर्शन” शब्द का विशेष महत्व है। भारत को प्रायः “दर्शन की भूमि” कहा जाता है क्योंकि यहाँ जीवन के प्रत्येक पक्ष को गहराई से समझने और उसका दार्शनिक विवेचन करने की परंपरा रही है।
साधारण दृष्टि में “दर्शन” का अर्थ है – देखना।लेकिन भारतीय विचारधारा में दर्शन का अर्थ केवल आँखों से देखने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह है – सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव करना, आत्मा और परमात्मा के रहस्यों को जानना, तथा जीवन के परम उद्देश्य की खोज करना।
दर्शन केवल बुद्धि-विचार या तर्क का विषय नहीं है, बल्कि यह अनुभव, साधना और आत्मबोध पर आधारित है। भारतीय ऋषियों ने दर्शन को केवल सैद्धांतिक ज्ञान नहीं माना, बल्कि जीवन की व्यावहारिक दिशा देने वाला विज्ञान कहा है। यही कारण है कि भारतीय दर्शन का लक्ष्य केवल ज्ञानार्जन नहीं, बल्कि मोक्ष और निःश्रेयस (परम कल्याण) की प्राप्ति है।
यूरोपीय परंपरा में Philosophy का अर्थ है – “Love of Wisdom” (ज्ञान से प्रेम), जबकि भारतीय परंपरा में दर्शन का अर्थ है – “सत्य का साक्षात्कार”। यही इसकी विशेषता है कि यहाँ दर्शन केवल चिंतन न होकर अनुभूति और साधना भी है।
भारतीय संस्कृति और ज्ञान-परंपरा में “दर्शन” शब्द का विशेष महत्व है। भारत को प्रायः “दर्शन की भूमि” कहा जाता है क्योंकि यहाँ जीवन के प्रत्येक पक्ष को गहराई से समझने और उसका दार्शनिक विवेचन करने की परंपरा रही है।
दर्शन केवल बुद्धि-विचार या तर्क का विषय नहीं है, बल्कि यह अनुभव, साधना और आत्मबोध पर आधारित है। भारतीय ऋषियों ने दर्शन को केवल सैद्धांतिक ज्ञान नहीं माना, बल्कि जीवन की व्यावहारिक दिशा देने वाला विज्ञान कहा है। यही कारण है कि भारतीय दर्शन का लक्ष्य केवल ज्ञानार्जन नहीं, बल्कि मोक्ष और निःश्रेयस (परम कल्याण) की प्राप्ति है।
यूरोपीय परंपरा में Philosophy का अर्थ है – “Love of Wisdom” (ज्ञान से प्रेम), जबकि भारतीय परंपरा में दर्शन का अर्थ है – “सत्य का साक्षात्कार”। यही इसकी विशेषता है कि यहाँ दर्शन केवल चिंतन न होकर अनुभूति और साधना भी है।
(क) शब्दार्थ (Etymology)
-
‘दर्शन’ शब्द संस्कृत धातु ‘दृश्’ (Drish) से बना है, जिसका अर्थ है – देखना, जानना, अनुभव करना।
-
यहाँ “देखना” का तात्पर्य केवल नेत्रों से देखना नहीं, बल्कि परम सत्य का साक्षात्कार करना है।
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‘दर्शन’ शब्द संस्कृत धातु ‘दृश्’ (Drish) से बना है, जिसका अर्थ है – देखना, जानना, अनुभव करना।
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यहाँ “देखना” का तात्पर्य केवल नेत्रों से देखना नहीं, बल्कि परम सत्य का साक्षात्कार करना है।
(ख) सामान्य अर्थ (General Meaning)
-
दर्शन = वस्तु को उसके वास्तविक स्वरूप में देखना।(To see the reality as it truly is.)
-
दर्शन केवल सैद्धांतिक विचार न होकर जीवन जीने की एक पद्धति (Way of Life) है।
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दर्शन = वस्तु को उसके वास्तविक स्वरूप में देखना।(To see the reality as it truly is.)
-
दर्शन केवल सैद्धांतिक विचार न होकर जीवन जीने की एक पद्धति (Way of Life) है।
(ग) परिभाषाएँ (Definitions)
-
आदि शंकराचार्य (Adi Shankaracharya):
“तत्त्वदर्शनमेव दर्शनम्”→ परम सत्य का साक्षात्कार ही दर्शन है।
-
यास्काचार्य (Yaska):→ दर्शन वह है जो हमें सत्य की ओर अग्रसर करता है।Excellent, Kesar Singh ji ✅Here’s your complete, professionally rewritten and formatted version — polished for academic presentation or direct Google Docs upload.It keeps your original meaning fully intact but improves flow, structure, and readability.
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आदि शंकराचार्य (Adi Shankaracharya):
“तत्त्वदर्शनमेव दर्शनम्”→ परम सत्य का साक्षात्कार ही दर्शन है। -
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3. Modern View of Philosophy
-
Philosophy is the science that seeks to answer the fundamental questions related to life, the universe, the soul, and God.Thus, in essence:
Darshana = Intellectual Reflection + Experiential Realization of Truth
In other words, Philosophy is both a rational inquiry and an inner realization of the ultimate reality.
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Philosophy is the science that seeks to answer the fundamental questions related to life, the universe, the soul, and God.Thus, in essence:
Darshana = Intellectual Reflection + Experiential Realization of Truth
In other words, Philosophy is both a rational inquiry and an inner realization of the ultimate reality.
2. भारतीय दर्शन का वर्गीकरण
-
(Classification of Indian Philosophy)
भारतीय दर्शन को दो मुख्य भागों में विभाजित किया गया है —
-
आस्तिक दर्शन (Āstika Darshana) – जो वेदों की प्रामाणिकता को स्वीकार करते हैं।
-
नास्तिक दर्शन (Nāstika Darshana) – जो वेदों की प्रामाणिकता को अस्वीकार करते हैं।
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(Classification of Indian Philosophy)
भारतीय दर्शन को दो मुख्य भागों में विभाजित किया गया है —
-
आस्तिक दर्शन (Āstika Darshana) – जो वेदों की प्रामाणिकता को स्वीकार करते हैं।
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नास्तिक दर्शन (Nāstika Darshana) – जो वेदों की प्रामाणिकता को अस्वीकार करते हैं।
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(क) आस्तिक दर्शन (Āstika Darshana – Orthodox Systems)
1. ‘आस्तिक’ शब्द का अर्थ
-
-
आस्तिक (Āstika) शब्द ‘अस्ति’ (It exists) से बना है।
-
सामान्य अर्थ: “जो ईश्वर में विश्वास रखता हो।”
-
भारतीय दर्शन में विशिष्ट अर्थ: वह दर्शन जो वेदों की प्रामाणिकता (Authority of Vedas) को मान्यता देता है।
Astika = Acceptance of the authority of the Vedas (not necessarily belief in God).
-
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आस्तिक (Āstika) शब्द ‘अस्ति’ (It exists) से बना है।
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सामान्य अर्थ: “जो ईश्वर में विश्वास रखता हो।”
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भारतीय दर्शन में विशिष्ट अर्थ: वह दर्शन जो वेदों की प्रामाणिकता (Authority of Vedas) को मान्यता देता है।
Astika = Acceptance of the authority of the Vedas (not necessarily belief in God).
-
2. आस्तिक दर्शनों की संख्या
-
कुल 6 प्रमुख आस्तिक दर्शन हैं, जिन्हें षड्दर्शन (Ṣaḍ-Darshana) कहा जाता है:
क्रम
दर्शन का नाम
आचार्य
1.
सांख्य दर्शन (Sāṃkhya)
कपिल मुनि (Kapila Muni)
2.
योग दर्शन (Yoga)
पतंजलि (Patanjali)
3.
न्याय दर्शन (Nyāya)
गौतम (Gautama)
4.
वैशेषिक दर्शन (Vaiśeṣika)
कणाद (Kanada)
5.
पूर्व मीमांसा (Pūrva Mīmāṃsā)
जैमिनि (Jaimini)
6.
उत्तर मीमांसा / वेदान्त (Uttara Mīmāṃsā / Vedānta)
व्यास / बादरायण (Vyasa / Badarayana)
-
कुल 6 प्रमुख आस्तिक दर्शन हैं, जिन्हें षड्दर्शन (Ṣaḍ-Darshana) कहा जाता है:
क्रम दर्शन का नाम आचार्य 1. सांख्य दर्शन (Sāṃkhya) कपिल मुनि (Kapila Muni) 2. योग दर्शन (Yoga) पतंजलि (Patanjali) 3. न्याय दर्शन (Nyāya) गौतम (Gautama) 4. वैशेषिक दर्शन (Vaiśeṣika) कणाद (Kanada) 5. पूर्व मीमांसा (Pūrva Mīmāṃsā) जैमिनि (Jaimini) 6. उत्तर मीमांसा / वेदान्त (Uttara Mīmāṃsā / Vedānta) व्यास / बादरायण (Vyasa / Badarayana)
3. संक्षिप्त परिचय – आस्तिक षड्दर्शन
(1) सांख्य दर्शन (Sāṃkhya – Kapila Muni)
-
-
द्वैतवादी दर्शन (Dualistic System)
-
जगत की उत्पत्ति पुरुष (Consciousness) और प्रकृति (Matter) से।
-
पुरुष = निष्क्रिय साक्षी, प्रकृति = सक्रिय सृजनशक्ति।
-
मोक्ष तब प्राप्त होता है जब पुरुष और प्रकृति का भेद ज्ञान से प्रकट होता है।
-
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द्वैतवादी दर्शन (Dualistic System)
-
जगत की उत्पत्ति पुरुष (Consciousness) और प्रकृति (Matter) से।
-
पुरुष = निष्क्रिय साक्षी, प्रकृति = सक्रिय सृजनशक्ति।
-
मोक्ष तब प्राप्त होता है जब पुरुष और प्रकृति का भेद ज्ञान से प्रकट होता है।
-
(2) योग दर्शन (Yoga – Patanjali)
-
-
व्यावहारिक दर्शन, सांख्य से गहरा संबंध।
-
ग्रंथ: पतंजलि योगसूत्र → अष्टांग योग (Eight Limbs of Yoga)।
-
लक्ष्य: चित्तवृत्ति निरोध (Control of mental modifications) → मोक्ष।
-
ईश्वर को विशेष पुरुष के रूप में माना गया।
-
-
व्यावहारिक दर्शन, सांख्य से गहरा संबंध।
-
ग्रंथ: पतंजलि योगसूत्र → अष्टांग योग (Eight Limbs of Yoga)।
-
लक्ष्य: चित्तवृत्ति निरोध (Control of mental modifications) → मोक्ष।
-
ईश्वर को विशेष पुरुष के रूप में माना गया।
-
(3) न्याय दर्शन (Nyāya – Gautama)
-
-
तर्क और विचार का दर्शन।
-
चार प्रमाण (Sources of Knowledge):
-
प्रत्यक्ष (Perception)
-
अनुमान (Inference)
-
उपमान (Comparison)
-
शब्द (Verbal Testimony)
-
सत्य का ज्ञान = मोक्ष की प्राप्ति।
-
-
तर्क और विचार का दर्शन।
-
चार प्रमाण (Sources of Knowledge):
-
प्रत्यक्ष (Perception)
-
अनुमान (Inference)
-
उपमान (Comparison)
-
शब्द (Verbal Testimony)
-
-
सत्य का ज्ञान = मोक्ष की प्राप्ति।
-
(4) वैशेषिक दर्शन (Vaiśeṣika – Kanada)
-
-
अणुवाद (Atomic Theory) पर आधारित।
-
जगत = पदार्थों का समूह।
-
सात पदार्थ: द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय, अभाव।
-
न्याय दर्शन से घनिष्ठ संबंध।
-
-
अणुवाद (Atomic Theory) पर आधारित।
-
जगत = पदार्थों का समूह।
-
सात पदार्थ: द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय, अभाव।
-
न्याय दर्शन से घनिष्ठ संबंध।
-
(5) पूर्व मीमांसा (Pūrva Mīmāṃsā – Jaimini)
-
-
मुख्यतः कर्मकाण्ड (Vedic Rituals) पर आधारित।
-
वेदों के पूर्व भाग (संहिताएँ, ब्राह्मण) का अध्ययन।
-
धर्म = यज्ञ और कर्मों का पालन।
-
मोक्ष = शुभ कर्मों के फल से क्रमशः प्राप्ति।
-
-
मुख्यतः कर्मकाण्ड (Vedic Rituals) पर आधारित।
-
वेदों के पूर्व भाग (संहिताएँ, ब्राह्मण) का अध्ययन।
-
धर्म = यज्ञ और कर्मों का पालन।
-
मोक्ष = शुभ कर्मों के फल से क्रमशः प्राप्ति।
-
(6) उत्तर मीमांसा / वेदान्त (Uttara Mīmāṃsā – Vyasa / Badarayana)
-
-
वेदों के उत्तर भाग (उपनिषद्) पर आधारित।
-
मूल ग्रंथ: ब्रह्मसूत्र।
-
मुख्य विचार:
-
ब्रह्म = परम सत्य
-
जीव और ब्रह्म का ऐक्य (अद्वैत)
-
प्रमुख मत:
-
अद्वैत वेदान्त – आदि शंकराचार्य
-
विशिष्टाद्वैत – रामानुजाचार्य
-
द्वैत – माध्वाचार्य
-
-
वेदों के उत्तर भाग (उपनिषद्) पर आधारित।
-
मूल ग्रंथ: ब्रह्मसूत्र।
-
मुख्य विचार:
-
ब्रह्म = परम सत्य
-
जीव और ब्रह्म का ऐक्य (अद्वैत)
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प्रमुख मत:
-
अद्वैत वेदान्त – आदि शंकराचार्य
-
विशिष्टाद्वैत – रामानुजाचार्य
-
द्वैत – माध्वाचार्य
-
-
4. आस्तिक दर्शन की विशेषताएँ (Features)
-
-
वेदों की प्रामाणिकता को स्वीकारना।
-
मोक्ष को परम पुरुषार्थ मानना।
-
आत्मा और ब्रह्म को मान्यता देना।
-
ईश्वर को कुछ दर्शनों में स्वीकार (योग, वेदान्त) और कुछ में नहीं (सांख्य, मीमांसा)।
-
ज्ञान, तर्क, योग और कर्म सभी का समन्वय।
-
-
वेदों की प्रामाणिकता को स्वीकारना।
-
मोक्ष को परम पुरुषार्थ मानना।
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आत्मा और ब्रह्म को मान्यता देना।
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ईश्वर को कुछ दर्शनों में स्वीकार (योग, वेदान्त) और कुछ में नहीं (सांख्य, मीमांसा)।
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ज्ञान, तर्क, योग और कर्म सभी का समन्वय।
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(ख) नास्तिक दर्शन (Nāstika Darshana – Heterodox Systems)
1. ‘नास्तिक’ शब्द का अर्थ
-
-
नास्तिक = ‘न’ + ‘अस्ति’ → जो “अस्तित्व को न माने”।
-
भारतीय दर्शन में इसका अर्थ है — जो वेदों की प्रामाणिकता को अस्वीकार करे।
“नास्तिक” का अर्थ ईश्वर को न मानना नहीं, बल्कि वेदों को न मानना है।
-
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नास्तिक = ‘न’ + ‘अस्ति’ → जो “अस्तित्व को न माने”।
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भारतीय दर्शन में इसका अर्थ है — जो वेदों की प्रामाणिकता को अस्वीकार करे।
“नास्तिक” का अर्थ ईश्वर को न मानना नहीं, बल्कि वेदों को न मानना है।
-
2. नास्तिक दर्शनों की संख्या
-
तीन प्रमुख नास्तिक दर्शन:
-
बौद्ध दर्शन (Buddhism)
-
जैन दर्शन (Jainism)
-
चार्वाक दर्शन (Cārvāka / Lokāyata – Materialism)
-
तीन प्रमुख नास्तिक दर्शन:
-
बौद्ध दर्शन (Buddhism)
-
जैन दर्शन (Jainism)
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चार्वाक दर्शन (Cārvāka / Lokāyata – Materialism)
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3. संक्षिप्त परिचय – नास्तिक दर्शन
(1) बौद्ध दर्शन (Buddhism – Gautama Buddha)
-
-
संस्थापक: गौतम बुद्ध (563–483 BCE)
-
वेद और ईश्वर की प्रामाणिकता का अस्वीकार।
-
मुख्य सिद्धांत:
-
चार आर्य सत्य (Four Noble Truths)
-
जीवन दुःखमय है।
-
दुःख का कारण तृष्णा है।
-
तृष्णा का निरोध संभव है।
-
निरोध का मार्ग = अष्टांगिक मार्ग।
-
अनात्मवाद – आत्मा का अस्तित्व नहीं।
-
क्षणिकवाद – सब वस्तुएँ क्षणिक हैं।
-
लक्ष्य: निर्वाण (Freedom from suffering)।
-
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संस्थापक: गौतम बुद्ध (563–483 BCE)
-
वेद और ईश्वर की प्रामाणिकता का अस्वीकार।
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मुख्य सिद्धांत:
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चार आर्य सत्य (Four Noble Truths)
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जीवन दुःखमय है।
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दुःख का कारण तृष्णा है।
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तृष्णा का निरोध संभव है।
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निरोध का मार्ग = अष्टांगिक मार्ग।
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अनात्मवाद – आत्मा का अस्तित्व नहीं।
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क्षणिकवाद – सब वस्तुएँ क्षणिक हैं।
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लक्ष्य: निर्वाण (Freedom from suffering)।
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(2) जैन दर्शन (Jainism – Mahavira)
-
-
संस्थापक: महावीर स्वामी (599–527 BCE)
-
आत्मा और कर्म में विश्वास, वेदों का निषेध।
-
मुख्य सिद्धांत:
-
जीव और अजीव (Living & Non-Living)
-
अनेकांतवाद – सत्य को अनेक दृष्टिकोणों से देखना।
-
अहिंसा – सर्वोच्च धर्म।
-
त्रिरत्न:
-
सम्यक दर्शन
-
सम्यक ज्ञान
-
सम्यक चरित्र
-
लक्ष्य: मोक्ष (Liberation of Soul from Karma)
-
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संस्थापक: महावीर स्वामी (599–527 BCE)
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आत्मा और कर्म में विश्वास, वेदों का निषेध।
-
मुख्य सिद्धांत:
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जीव और अजीव (Living & Non-Living)
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अनेकांतवाद – सत्य को अनेक दृष्टिकोणों से देखना।
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अहिंसा – सर्वोच्च धर्म।
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त्रिरत्न:
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सम्यक दर्शन
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सम्यक ज्ञान
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सम्यक चरित्र
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लक्ष्य: मोक्ष (Liberation of Soul from Karma)
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(3) चार्वाक दर्शन (Cārvāka / Lokāyata – Materialism)
-
-
संस्थापक: बृहस्पति (कुछ ग्रंथों के अनुसार)
-
सबसे प्राचीन भौतिकवादी दर्शन।
-
वेद, आत्मा, ईश्वर, पुनर्जन्म – सभी का निषेध।
-
सिद्धांत:
-
प्रत्यक्ष ही प्रमाण है (Perception only valid means of knowledge)।
-
आत्मा = शरीर का गुण मात्र।
-
मोक्ष या स्वर्ग-नरक का अस्तित्व नहीं।
-
सुख ही जीवन का परम लक्ष्य।
“यावत् जीवेत् सुखं जीवेत्, ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्।”(जब तक जीवित हो, सुख से जियो; चाहे ऋण लेकर घी पियो।)
-
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संस्थापक: बृहस्पति (कुछ ग्रंथों के अनुसार)
-
सबसे प्राचीन भौतिकवादी दर्शन।
-
वेद, आत्मा, ईश्वर, पुनर्जन्म – सभी का निषेध।
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सिद्धांत:
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प्रत्यक्ष ही प्रमाण है (Perception only valid means of knowledge)।
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आत्मा = शरीर का गुण मात्र।
-
मोक्ष या स्वर्ग-नरक का अस्तित्व नहीं।
-
सुख ही जीवन का परम लक्ष्य।
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“यावत् जीवेत् सुखं जीवेत्, ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्।”(जब तक जीवित हो, सुख से जियो; चाहे ऋण लेकर घी पियो।)
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4. नास्तिक दर्शन की विशेषताएँ (Features)
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वेदों की प्रामाणिकता का निषेध।
-
कर्मकाण्ड को अस्वीकार।
-
ईश्वर और आत्मा के विषय में विविध मत।
-
अनुभव और व्यवहार पर बल।
-
मोक्ष या सुख की प्राप्ति के भिन्न मार्ग।
-
-
वेदों की प्रामाणिकता का निषेध।
-
कर्मकाण्ड को अस्वीकार।
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ईश्वर और आत्मा के विषय में विविध मत।
-
अनुभव और व्यवहार पर बल।
-
मोक्ष या सुख की प्राप्ति के भिन्न मार्ग।
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भारतीय दर्शन की विशेषताएँ (Characteristics of Indian Philosophy)
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आध्यात्मिकता (Spirituality) – आत्मा और परमात्मा का साक्षात्कार ही मुख्य उद्देश्य।
-
मोक्ष प्रधानता (Primacy of Liberation) – सभी दर्शनों का अंतिम लक्ष्य मोक्ष।
-
व्यावहारिकता (Practical Nature) – दर्शन जीवन जीने की कला है।
-
धर्म और नैतिकता पर बल (Dharma & Ethics) – चार पुरुषार्थ: धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष।
-
सहिष्णुता और समन्वय (Tolerance & Synthesis) – विविध मतों के बावजूद एकता।
-
अनुभव पर आधारित (Experience & Intuition) – सत्य तर्क से नहीं, अनुभव से जाना जाता है।
-
परम सत्य की खोज (Quest for Ultimate Reality) – “What is Truth?”
-
लौकिक और पारलौकिक का समन्वय (Worldly & Spiritual Integration)
-
विविधता में एकता (Unity in Diversity) – विभिन्न दर्शनों का एक ही लक्ष्य: मोक्ष।
भारतीय दर्शन केवल सिद्धांत नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला है।इसका मूल उद्देश्य है – आत्मज्ञान, धर्म, और मोक्ष।
-
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आध्यात्मिकता (Spirituality) – आत्मा और परमात्मा का साक्षात्कार ही मुख्य उद्देश्य।
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मोक्ष प्रधानता (Primacy of Liberation) – सभी दर्शनों का अंतिम लक्ष्य मोक्ष।
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व्यावहारिकता (Practical Nature) – दर्शन जीवन जीने की कला है।
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धर्म और नैतिकता पर बल (Dharma & Ethics) – चार पुरुषार्थ: धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष।
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सहिष्णुता और समन्वय (Tolerance & Synthesis) – विविध मतों के बावजूद एकता।
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अनुभव पर आधारित (Experience & Intuition) – सत्य तर्क से नहीं, अनुभव से जाना जाता है।
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परम सत्य की खोज (Quest for Ultimate Reality) – “What is Truth?”
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लौकिक और पारलौकिक का समन्वय (Worldly & Spiritual Integration)
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विविधता में एकता (Unity in Diversity) – विभिन्न दर्शनों का एक ही लक्ष्य: मोक्ष।
भारतीय दर्शन केवल सिद्धांत नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला है।इसका मूल उद्देश्य है – आत्मज्ञान, धर्म, और मोक्ष। -
सामान्य दार्शनिक सिद्धांत (Common Philosophical Themes)
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विषय
विवरण
कर्म (Karma)
“As you sow, so shall you reap.” – कर्म केवल शारीरिक नहीं, मानसिक व वाचिक भी।
पुनर्जन्म (Rebirth)
आत्मा अमर है, कर्मानुसार नया जन्म लेती है।
मोक्ष (Liberation)
जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति ही परम लक्ष्य।
आत्मा (Ātman)
शाश्वत, चेतन और सच्चिदानंद स्वरूप।
ब्रह्म (Brahman)
परम सत्य, अनंत, सर्वव्यापक – आत्मा और ब्रह्म में अभेद (Advaita Vedanta)।
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विषय विवरण कर्म (Karma) “As you sow, so shall you reap.” – कर्म केवल शारीरिक नहीं, मानसिक व वाचिक भी। पुनर्जन्म (Rebirth) आत्मा अमर है, कर्मानुसार नया जन्म लेती है। मोक्ष (Liberation) जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति ही परम लक्ष्य। आत्मा (Ātman) शाश्वत, चेतन और सच्चिदानंद स्वरूप। ब्रह्म (Brahman) परम सत्य, अनंत, सर्वव्यापक – आत्मा और ब्रह्म में अभेद (Advaita Vedanta)।
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